स्वधा: स्त्रोत पितृ शांति का अचूक उपाय।

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स्वधा स्तोत्र: पितृ दोष निवारण और पूर्वजों की शांति का सबसे शक्तिशाली उपाय।

नमस्ते मित्रों। क्या आप कभी ऐसा महसूस करते हैं कि, आपके प्रयासों के बावजूद जीवन में स्थिरता नहीं आ पा रही। क्या पारिवारिक समस्याएं, स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां या मानसिक अशांति आपको परेशान कर रही है। कभी-कभी इन समस्याओं का कारण हमारे पूर्वजों से जुड़ी ऊर्जात्मक बाधाएं भी हो सकती हैं। आज हम बात कर रहे हैं, स्वधा स्तोत्र की, जो ब्रह्मा वैवर्त महापुराण का एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है।

स्वधा कौन हैं और क्यों है यह स्तोत्र विशेष।

स्वधा केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक दिव्य शक्ति हैं। वे पितृ देवताओं की तृप्ति और आशीर्वाद प्रदान करने वाली देवी हैं। जब भी हम श्राद्ध कर्म या तर्पण करते हैं, तो स्वधा नाम का उच्चारण ही उस अर्पण को पूर्वजों तक पहुंचाता है। ब्रह्मा जी द्वारा रचित यह स्तोत्र न केवल पितृ दोष को दूर करता है, बल्कि श्राद्ध और तर्पण का फल भी प्रदान करता है।

स्तोत्र का महत्व और लाभ‌।

• स्वधा का उच्चारण मात्र करने से व्यक्ति सभी तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त करता है।

• यह स्तोत्र सभी प्रकार के पापों से मुक्ति दिलाता है और वाजपेय यज्ञ के समान फल प्रदान करता है।

• यदि कोई व्यक्ति तीन बार स्वधा स्वधा स्वधा का स्मरण कर ले, तो उसे श्राद्ध और तर्पण का पूरा फल मिल जाता है।

• जो व्यक्ति श्राद्ध के समय इस स्तोत्र को एकाग्रचित्त होकर सुनता है, उसे सौ श्राद्धों के समान पुण्य प्राप्त होता है।

• त्रिसंध्या काल में इस स्तोत्र का पाठ करने वाले को सुशील, गुणवान जीवन साथी और संतान की प्राप्ति होती है‌

स्वधा स्तोत्र का पूर्ण पाठ।

ब्रह्मोवाच‌

स्वधोच्चारणमात्रेण तीर्थस्नायी भवेन्नर। मुच्यते सर्वपापेभ्यो वाजपेयफलं लभेत् ॥१॥

स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं यदि वारत्रयं स्मरेत्। श्राद्धस्य फलमाप्नोति कालस्य तर्पणस्य च ॥२॥

श्राद्धकाले स्वधास्तोत्रं यः शृणोति समाहितः। लभेच्छ्राद्धशतानां च पुण्यमेव न संशयः ॥३॥

स्वधास्वधा स्वधेत्येवं त्रिसन्ध्यं यःपठेन्नरः। प्रियां विनीतां स लभेत् साध्वीं पुत्रं गुणान्वितम् ॥४॥

पितॄणां प्राणतुल्या त्वं द्विजजीवनरूपिणी। श्राद्धाधिष्ठातृदेवी च श्राद्धादीनां फलप्रदा ॥५॥

बहिर्गच्छ मन्मनसः पितॄणां तुष्टिहेतवे। सम्प्रीतये द्विजातीनां गृहिणां वृद्धिहेतवे ॥६॥

नित्या त्वं नित्यस्वरूपासि गुणरूपासि सुव्रते। आविर्भावस्तिरोभावः सृष्टौ च प्रलये तव ॥७॥

ॐ स्वस्तिश्च नमः स्वाहा स्वधा त्वं दक्षिणा तथा। निरूपिताश्चतुर्वेदे षट् प्रशस्ताश्च कर्मिणाम् ॥८॥

पुरासीस्त्वं स्वधागोपी गोलोके राधिकासखी। धृतोरसि स्वधात्मानं कृतं तेन स्वधा स्मृता ॥९॥

इत्येवमुक्त्वा स ब्रह्मा ब्रह्मलोके च संसदि। तस्थौ च सहसा सद्यः स्वधा साविर्बभूव ह ॥१०॥

तदा पितृभ्यः प्रददौ तामेव कमलाननाम्। तां सम्प्राप्य ययुस्ते च पितरश्च प्रहर्षिताः ॥११॥

स्वधास्तोत्रमिदं पुण्यं यः शृणोति समाहितः। स स्नातः सर्वतीर्थेषु वेदपाठफलं लभेत् ॥१२॥

इति श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणे प्रकृतिखण्डे ब्रह्माकृतं स्वधास्तोत्रं सम्पूर्णम्

साधना विधि:-- कैसे करें स्वधा स्तोत्र का पाठ।

समय: पितृ पक्ष, अमावस्या, या किसी भी सोमवार या रविवार को यह स्तोत्र पढ़ना विशेष फलदायी होता है। प्रातः काल या संध्या काल सबसे उत्तम है।

स्थान और आसन: किसी शांत स्थान पर लाल या काले रंग का आसन बिछाएं। यदि संभव हो तो, पूर्वजों की तस्वीर या शालिग्राम के सामने बैठें।

संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प लें कि आप इस स्तोत्र का पाठ पितृ शांति और आशीर्वाद प्राप्ति के लिए कर रहे हैं।

पाठ विधि: सर्वप्रथम गणेश वंदना करें। फिर ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सरस्वती का स्मरण करें। इसके बाद ऊपर दिए गए स्वधा स्तोत्र का स्पष्ट उच्चारण के साथ पाठ करें। प्रतिदिन कम से कम एक बार, विशेष दिनों पर 11 या 21 बार पाठ कर सकते हैं।

समापन: पाठ के बाद जल अर्पित करें और पितृ देवताओं से क्षमा प्रार्थना करें। अंत में शांति मंत्र का जाप करें।

वैज्ञानिक और ऊर्जात्मक दृष्टिकोण

आधुनिक शोध बताते हैं कि मंत्रोच्चारण की ध्वनि तरंगें हमारे मस्तिष्क और ऊर्जा क्षेत्र पर गहरा प्रभाव डालती हैं। स्वधा शब्द का कंपन विशेष रूप से पितृ ऊर्जा केंद्र से जुड़ा हुआ माना जाता है।

 नियमित पाठ से करने से पितरों कि कृपा जल्दी प्राप्त होती है:--

• पारिवारिक कलह और अकारण बाधाओं में कमी आती है।

• मानसिक शांति और निर्णय लेने की क्षमता में सुधार होता है।

• पूर्वजों के आशीर्वाद का अनुभव होने लगता है, जिससे जीवन में स्थिरता आती है, बिगड़े काम बनने लगते हैं, हर क्षेत्र में तरक्की उन्नति होने लगती है।

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अनिल सुधांशु 
ज्योतिषाचार्य 
नीम करौली आश्रम कैंची धाम नैनीताल (उत्तरांचल)

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