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शनिदेव का पूर्व जन्म से क्या संबंध है?

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*** शनि का पूर्वजन्म से क्या संबंध है? ज्योतिष शास्त्र में शनि को 'कर्मफलदाता' माना जाता है, जो पूर्वजन्म के अधूरे कार्यों (अपूर्ण कर्मों), पाप और पुण्य के आधार पर इस जीवन में दंड या पुरस्कार देते हैं। कुंडली में शनि की स्थिति पिछले जन्म के ऋण, दरिद्रता, या जिम्मेदारियों को न निभाने की सजा दर्शाती है, जिसे इस जन्म में मेहनत और अनुशासन से सुधारना होता है।  शनि और पूर्वजन्म के संबंध के प्रमुख बिंदु:--- अपूर्ण कर्मा : ---शनिदेव कुंडली के जिस भाव में बैठे होते हैं, वह क्षेत्र आपके पिछले जन्म के अधूरें कार्यों को दर्शाता है, जिसे इस जन्म में पूरा करना आवश्यक होता है। पूर्वजन्म का ऋण:--- यदि शनि पहले (लग्न), चौथे, सातवें, या ग्यारहवें भाव में हो, तो यह पिछले जन्म में दरिद्रता या पाप कर्मों का संकेत दे सकता है। कर्मों का दंड: ---यदि किसी की कुंडली में शनि कमजोर या नीच का है, तो माना जाता है कि उसने पिछले जन्म में अधीनस्थों का हक मारा था या अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से नहीं निभाया था। शनि की स्थिति और पूर्वजन्म के संकेत:-- 5वां भाव: पूर्वजन्म में किसी को हथियार से कष्ट देने के कारण संत...

धन दौलत पाने का अचूक उपाय।

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*** रावण संहिता के अनुसार कुछ ऐसे तांत्रिक उपाय जिनसे किसी भी व्यक्ति की किस्मत चमक सकती है...। 1. धन प्राप्ति का उपाय: किसी भी शुभ मुहूर्त में या किसी शुभ दिन में सुबह जल्दी उठें। इसके बाद नित्यकर्मों से निवृत्त होकर किसी पवित्र नदी या जलाशय के किनारे जाएं। किसी शांत एवं एकांत स्थान पर वट वृक्ष के नीचे चमड़े का आसन बिछाएं। आसन पर बैठकर धन प्राप्ति मंत्र का जप करें। धन प्राप्ति का मंत्र:-- ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं नम: ध्व: ध्व: स्वाहा। इस मंत्र का जप आपको 21 दिनों तक करना चाहिए। मंत्र जप के लिए रुद्राक्ष की माला का उपयोग करें। 21 दिनों में अधिक से अधिक संख्या में मंत्र जप करें। जैसे ही यह मंत्र सिद्ध हो जाएगा, आपको अचानक धन प्राप्ति अवश्य कराएगा। 2.यदि किसी व्यक्ति को धन प्राप्त करने में बार-बार रुकावटें आ रही हों तो उसे यह उपाय करना चाहिए। यह उपाय 40 दिनों तक किया जाना चाहिए। इसे अपने घर पर ही किया जा सकता है। उपाय के अनुसार धन प्राप्ति मंत्र का जप करना है।  प्रतिदिन 108 बार। मंत्र: ऊँ सरस्वती ईश्वरी भगवती माता क्रां क्लीं, श्रीं श्रीं मम धनं देहि फट् स्वाहा। इस मंत्र का जप नियमित रूप...

पितरों के लिए पहली रोटी क्यों जरूरी है?

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*** क्यों जरूरी है, भोजन की पहली रोटी पितरों के नाम, जानिए उस एक निवाले का रहस्य जो आपके पूरे परिवार का पेट भर सकता है!! हम सब रोज़ अपने और अपने परिवार के लिए खाना बनाते हैं, लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि, हमारी दादी-नानी खाना बनाने के बाद पहली रोटी अलग क्यों निकाल कर रखती थीं? क्या यह सिर्फ एक पुरानी रस्म है, या इसके पीछे कोई बहुत बड़ा विज्ञान और आध्यात्मिक रहस्य छिपा है? शास्त्रों में कहा गया है कि हमारे घर में जो अन्न आता है, वह हमारे पूर्वजों के पुण्य कर्मों का फल है। इसलिए, उस अन्न का पहला भोग उन्हें अर्पित करना हमारा कर्तव्य है। जब हम भोजन का एक छोटा सा हिस्सा पितरों के नाम से निकालते हैं, तो वे सूक्ष्म रूप में उसे ग्रहण करते हैं और बदले में हमारे घर में 'अन्नपूर्णा' का वरदान देते हैं। चलिए समझते हैं कि यह छोटी सी परंपरा आपके जीवन में कितनी बड़ी खुशहाली ला सकती है। पितरों के नाम भोजन निकालने के पीछे के गहरे कारण:--- ऋण से मुक्ति: हम पर तीन मुख्य ऋण होते हैं— देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। भोजन का पहला हिस्सा निकालने से हम प्रतिदिन पितृ ऋण का एक छोटा हिस्सा चुकाते हैं, जि...

स्वर्ण मंदिर अमृतसर का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व।

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***  स्वर्ण मंदिर अमृतसर – सिक्खों कि, आस्था, शांति और एकता का प्रतीक। भारत में स्थित स्वर्ण मंदिर, जिसे हरमंदिर साहिब या गोल्डन टेंपल के नाम से भी जाना जाता है, न केवल सिख धर्म का सबसे पवित्र स्थल है, बल्कि यह पूरी मानवता के लिए शांति, प्रेम और समानता का संदेश देता है। यह मंदिर पंजाब के अमृतसर शहर में स्थित है और हर दिन लाखों श्रद्धालु यहाँ दर्शन करने आते हैं। स्वर्ण मंदिर का इतिहास स्वर्ण मंदिर की स्थापना का इतिहास अत्यंत प्रेरणादायक है। यह मंदिर अनेक बार विध्वंस के दौर से गुजरा, लेकिन हर बार सिख समुदाय की आस्था ने इसे पहले से अधिक भव्य रूप में पुनः स्थापित किया। सन् 1830 में महाराजा रणजीत सिंह ने इस पवित्र स्थल का पुनर्निर्माण करवाया। उन्होंने पूरे मंदिर को संगमरमर और सोने की परतों से सजवाया, जिसके कारण इसे “स्वर्ण मंदिर” कहा जाने लगा। इसकी सुंदरता, शांति और आध्यात्मिक वातावरण हर आगंतुक को दिव्यता का अनुभव कराते हैं। -आध्यात्मिकता और धार्मिक आस्था का केंद्र स्वर्ण मंदिर केवल एक इमारत नहीं, बल्कि यह आध्यात्मिक समाधान और आत्मिक शांति का केंद्र है। यहाँ हर धर्म, हर जाति और हर वर्ग ...

स्वधा: स्त्रोत पितृ शांति का अचूक उपाय।

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*** स्वधा स्तोत्र: पितृ दोष निवारण और पूर्वजों की शांति का सबसे शक्तिशाली उपाय। नमस्ते मित्रों। क्या आप कभी ऐसा महसूस करते हैं कि, आपके प्रयासों के बावजूद जीवन में स्थिरता नहीं आ पा रही। क्या पारिवारिक समस्याएं, स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां या मानसिक अशांति आपको परेशान कर रही है। कभी-कभी इन समस्याओं का कारण हमारे पूर्वजों से जुड़ी ऊर्जात्मक बाधाएं भी हो सकती हैं। आज हम बात कर रहे हैं, स्वधा स्तोत्र की, जो ब्रह्मा वैवर्त महापुराण का एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। स्वधा कौन हैं और क्यों है यह स्तोत्र विशेष। स्वधा केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक दिव्य शक्ति हैं। वे पितृ देवताओं की तृप्ति और आशीर्वाद प्रदान करने वाली देवी हैं। जब भी हम श्राद्ध कर्म या तर्पण करते हैं, तो स्वधा नाम का उच्चारण ही उस अर्पण को पूर्वजों तक पहुंचाता है। ब्रह्मा जी द्वारा रचित यह स्तोत्र न केवल पितृ दोष को दूर करता है, बल्कि श्राद्ध और तर्पण का फल भी प्रदान करता है। स्तोत्र का महत्व और लाभ‌। • स्वधा का उच्चारण मात्र करने से व्यक्ति सभी तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त करता है। • यह स्तोत्र सभी प्रकार के पापों स...

राहु पोटली का अचूक उपाय, राजनीति और शेयर मार्केट में सफलता के लिए करें, ये उपाय।

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*** राहु पोटली का चमत्कारिक प्रयोग, आर्थिक उन्नति के साथ साथ सभी प्रकार कि, परेशानियों से छुटकारा मिलता है, शेयर मार्केट और राजनीति करने कि इच्छा रखने बालों को जरूर राहु कि, साधना करना चाहिए। पूर्व कर्मों के दोषों को समाप्त करने के लिए करें, राहु बीज मंत्र जाप, जाप की विधि, फायदे और सावधानियाँ। जैसा कि, आप जानते हैं,राहु देवता की साधना करने से जीवन में वह हासिल किया जा सकता है, जिसे देने की क्षमता किसी के पास नहीं है, राहु देवता वह सब कुछ दे सकते है, जो अन्य कोई ग्रह नहीं दे सकता, राहु जब देने पर आते है तो, सड़क से उठाकर आसमान में बिठा देते है और जब लेने पर आते है तो आसमान से उठाकर सड़क पर पटक देते है। राहु, नवग्रहों में एक छाया ग्रह है, जो मानसिक तनाव, भ्रम और आकस्मिक घटनाओं का कारक होता है,राहु बीज मंत्र का जाप मानसिक शांति और राहु से उत्पन्न समस्याओं से राहत प्रदान करता है, राहु बीज मंत्र का जाप कुंडली में राहु दोष, कालसर्प दोष और ग्रहण योग के प्रभाव को कम करता है,राहु बीज मंत्र का जाप करने के लिए शनिवार या बुधवार को एकांत स्थान पर बैठकर कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए।  अगर किस...

तंत्र शास्त्र में योनि पूजा का महत्व।

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*** तंत्र शास्त्र में योनि पूजा का महत्व।  योनितंत्र (योनितंत्र) - कामरूप क्षेत्र (असम) की एक अन्य रचना योनि (स्त्री जननांग) की पूजा और योनि तत्व के सेवन पर प्रकाश डालती है। आठ अध्यायों (पातालों) में योनि की पूजा की विधियाँ, योनि तत्व का महत्व, इसके सेवन और कौलाचार अनुष्ठान में इसके उपयोग के लाभ, दस महाविद्याओं का वर्णन, अवधूत के विशिष्ट लक्षण, स्त्रियों के प्रति श्रद्धा, उनकी पूजा की विधियाँ और समय, वीरभाव द्वारा पंचतत्वों का उपयोग, वीरसाधना की तकनीकें आदि का वर्णन किया गया है।। योनि तंत्र। पहला पाताल कैलाश पर्वत की चोटी पर विराजमान, देवताओं के देव, समस्त सृष्टि के गुरु, से मुस्कुराती हुई दुर्गा, नागानंदिनी ने प्रश्न पूछे। हे प्रभु, 64 तंत्रों की रचना हुई है। हे करुणा के सागर, मुझे इनमें से प्रमुख तंत्र के बारे में बताइए। महादेव ने कहा:-- प्रिय पार्वती, इस महान रहस्य को सुनो। तुमने इसे दस करोड़ बार सुनने की इच्छा जताई है। हे सुंदर, यह तुम्हारे नारी स्वभाव के कारण ही है कि, तुम मुझसे बार-बार पूछती हो। पार्वती, इसे हर संभव प्रयास से छुपाना चाहिए। मंत्र पीठ, यंत्र पीठ और योनि पीठ हैं...