राजा परीक्षित का जीवन के प्रति मोह भंग हो गया।
*** राजा परीक्षित का जीवन के प्रति मोह भंग। राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनाते-सुनाते शुकदेव जी महाराज को छह दिन व्यतीत हो चुके थे,तक्षक सर्प के काटने से राजा की मृत्यु में अब केवल एक दिन शेष था, फिर भी राजा परीक्षित के हृदय से शोक और मृत्यु का भय पूर्णतः दूर नहीं हुआ था। मृत्यु की घड़ी निकट आती देखकर उनका मन क्षुब्ध हो रहा था, भीतर कहीं न कहीं जीवन के प्रति आस शेष थी।। तब शुकदेव जी महाराज ने एक अर्थपूर्ण कथा आरंभ की— “राजन! बहुत समय पहले की बात है। एक राजा शिकार खेलने जंगल गया। संयोगवश वह मार्ग भटक गया और घने, निर्जन वन में जा पहुँचा। रास्ता खोजते-खोजते संध्या ढल गई। तभी मूसलाधार वर्षा होने लगी। चारों ओर अंधकार छा गया। सिंह, व्याघ्र और अन्य हिंसक पशुओं की गर्जना से जंगल भयावह हो उठा। राजा भयभीत हो गया और रात्रि बिताने के लिए किसी आश्रय की खोज करने लगा.. अचानक उसे दूर एक दीपक की क्षीण लौ दिखाई दी। उस ओर बढ़ने पर एक बहेलिये की छोटी-सी झोंपड़ी मिली। झोंपड़ी गंदी, संकरी, अंधेरी और दुर्गंध से भरी थी। बहेलिया चलने-फिरने में असमर्थ था, इसलिए उसी झोंपड़ी के एक कोने में उसने मल-मू...