भगवान शिव बोले, मेरे दर पर भूल कर भी किसी गरीब का अपमान ना हो?

काशी में सावन का पहला सोमवार था, और गंगा इस बार भी घाटों को छूने से पहले रुक रुक कर बह रही थी जैसे किसी की प्रतीक्षा में हो।

मणिकर्णिका से दो घाट छोड़ कर, विश्वनाथ गली के नुक्कड़ पर एक टूटी सी चौकी पर भीखू बैठता था। उम्र सत्तर के पार, शरीर पर गोंड जनजाति की धारीदार धोती, पैर नंगे, पीठ पर बाँस की टोकरी। वह मोची नहीं था, माली नहीं था, पुजारी तो बिल्कुल नहीं। लोग उसे पगला भीखू कहते।

उसका नियम पचास साल से एक ही था। भोर में तीन बजे उठना, पहाड़ी से उतर कर जंगल में जाना, बेल के सात पत्ते तोड़ना, धतूरे के दो फूल, और एक लोटा भर कर झरने का पानी लाना। बारह कोस पैदल चल कर वह काशी पहुँचता, विश्वनाथ के गर्भगृह में नहीं, बाहर नंदी के कान में धीरे से कहता, "बाबा, आज भी लाया हूँ," और पत्ते नंदी की पीठ पर रख देता। फिर घाट पर बैठ कर एक सौ आठ बार "नमः शिवाय" कहता, और बिना किसी से कुछ माँगे लौट जाता।

पुजारियों को यह अच्छा नहीं लगता था। मंदिर में सोने का कलश चढ़ाने वालों की सूची बनती थी, भीखू का नाम उसमें नहीं आता था। पर महादेव को शायद उसकी टोकरी की खुशबू ज्यादा प्रिय थी।

सेठ ज्वाला प्रसाद

उसी सावन में काशी में सेठ ज्वाला प्रसाद का नाम गूँज रहा था। कपड़े के व्यापारी, तीन हवेलियों के मालिक। उसने संकल्प लिया था कि विश्वनाथ मंदिर के उत्तरी द्वार पर संगमरमर का मंडप बनवाएगा। पाँच लाख स्वर्ण मुद्राएँ दान में दीं। महंत ने आशीर्वाद में कहा, "आप तो शिव के दूसरे रूप हैं।"

सेठ को यह वाक्य भीतर तक उतर गया। दूसरे सोमवार को वह पालकी में आया, रेशमी धोती, गले में रुद्राक्ष की नहीं, हीरे की माला। उसके नौकरों ने भीड़ हटाई। गर्भगृह में प्रवेश से पहले उसने देखा, नंदी की पीठ पर सूखे बेलपत्र और जंगली फूल पड़े हैं।

"यह गंदगी किसने रखी?" उसने चिल्ला कर पूछा।

एक युवा पुजारी ने धीरे से कहा, "भीखू रोज रख जाता है, सेठ जी। पचास साल से।"

सेठ हँसा। "जंगल का भील, न नहाया न धोया, और मेरे बनवाए मंडप में अपने पत्ते रखेगा? उठाओ इसे।"

नौकर ने पत्ते उठा कर फेंक दिए। ठीक उसी समय भीखू अपनी टोकरी लेकर आया। उसने देखा, उसके बेलपत्र सीढ़ियों पर बिखरे हैं, एक पर किसी का पैर पड़ गया है।

भीखू ने कुछ नहीं कहा। उसने झुक कर पत्ते उठाए, धूल झाड़ी, और नंदी के पास जाकर फिर से रखने लगा।

सेठ ने टोका, "ए बूढ़े, तुझे पता है मैं कौन हूँ?"

भीखू ने आँख उठाई। "आप दानी हैं, मालिक।"

"तो फिर तू रोज यहाँ अपनी जंगली पूजा क्यों करता है? शिव को सोना चाहिए, धतूरा नहीं।"

भीखू ने मुस्कुरा कर कहा, "बाबा को धतूरा ही प्रिय है, सेठ जी। सोना तो हम मनुष्यों को प्रिय है।"

सभा में हँसी गूँजी। सेठ का चेहरा तमतमा गया। उसने अपने जूते से भीखू की टोकरी को ठोकर मारी। लोटे का पानी छलक कर शिवलिंग की ओर जाने वाली नाली में बह गया। बेलपत्र कीचड़ में मिल गए।

"आज के बाद यहाँ दिखा तो टाँगें तोड़ दूँगा। भक्त बनता है। भक्त की जात देखी है?"

भीखू ने टोकरी उठाई। उसके हाथ काँप रहे थे, पर क्रोध से नहीं। उसने नंदी की ओर देखा, फिर सेठ की ओर, और केवल इतना कहा, "बाबा देख रहे हैं।"

वह चला गया। घाट पर बैठ कर उसने जप नहीं किया। पहली बार पचास साल में उसकी माला छूट गई।

रात में डमरू

उस रात काशी में अजीब सन्नाटा था। सावन की झड़ी रुकी हुई थी, हवा भारी। सेठ ज्वाला प्रसाद अपनी नई हवेली के झूले पर लेटा था। आधी रात को उसे लगा जैसे दूर कहीं डमरू बज रहा है। धीरे धीरे, फिर तेज।

उसने आँखें खोलीं। कमरे में कोई नहीं। पर दीवारों पर राख की गंध फैल गई। झूले के सामने एक साधु खड़ा था। शरीर पर भस्म, जटाओं में गंगा नहीं, धूल, गले में सर्प नहीं, रुद्राक्ष की टूटी माला। आँखें ऐसी जैसे भीतर आग सो रही हो।

सेठ चिल्लाया, "कौन हो?"

साधु ने कहा, "मैं वही हूँ जिसके द्वार पर तूने आज अपने जूते से जल गिराया।"

सेठ हँसा, "तू भीखू का साथी है? निकल जा, नहीं तो कोतवाल बुलाऊँगा।"

साधु ने डमरू एक बार और बजाया। उस ध्वनि से हवेली की दीवारें काँपीं। सेठ के गले की हीरे की माला टूट कर बिखर गई।

"मैं कोतवालों से नहीं डरता, ज्वाला। मैं उससे डरता हूँ जो अपने भक्त का अपमान सह ले। और मैं सहता नहीं।"

सेठ ने उठ कर मशाल उठाई, पर मशाल बुझ गई। साधु की आँखों में अब नीली लौ थी।

"तूने सोचा धन से शिव खरीदेगा। तूने मेरे भीखू को जात से तौला। सुन, मैं न ब्राह्मण देखता हूँ न भील। मैं केवल हृदय देखता हूँ। जिसने पचास साल बिना नागा बेलपत्र चढ़ाए, उसके एक आँसू का भार तेरे पाँच लाख से भारी है।"

सेठ काँपने लगा। "मैं... मैं प्रायश्चित करूँगा।"

साधु ने पीठ फेरी। "प्रायश्चित कल सभा में होगा। जब तू उसी जगह अपने हाथ से उसके पत्ते उठाएगा।"

साधु धुंध बन कर विलीन हो गया। सेठ सुबह तक सो नहीं सका।

तीसरा नेत्र

अगले दिन तीसरा सोमवार था। मंदिर में भीड़ दोगुनी। सेठ ने सोचा, रात का सपना था। वह फिर पालकी में आया, साथ में पुजारी, साथ में दान की थाली।

भीखू भी आया, पर आज टोकरी खाली थी। वह नंदी के पास बैठ गया, आँखें बंद कर लीं।

सेठ ने जानबूझ कर अनदेखा किया। वह गर्भगृह में घुसा, पुजारी ने मंत्र पढ़े। जैसे ही सेठ ने सोने का कलश शिवलिंग पर चढ़ाना चाहा, गर्भगृह में रखे घी के दीये एक साथ फड़फड़ाए।

लिंग से एक ठंडी भाप उठी। पुजारी पीछे हटे। पत्थर के शिवलिंग पर, जहाँ सामान्यतः जलधारा बहती है, वहाँ एक रेखा उभरी, जैसे बंद आँख।

भीड़ ने "हर हर महादेव" कहा, पर आवाज डर में डूब गई।

तभी नंदी के पास बैठे भीखू के शरीर से पसीना छूटने लगा। उसने आँखें खोलीं, और बिना कुछ समझे जोर से कहा, "नमः शिवाय।"

उस एक ध्वनि पर लिंग पर बनी रेखा खुल गई। वह तीसरा नेत्र था, न आग का, न प्रकाश का, केवल दृष्टि का। उस दृष्टि ने सेठ को देखा।

सेठ के हाथ का सोने का कलश पिघला नहीं, पर भारी हो गया जैसे पहाड़। वह उठा नहीं सका। उसके पैर जमीन से चिपक गए। मंदिर के घंटे अपने आप बजने लगे।

और तब गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं, एक आकृति खड़ी हुई। लगभग आठ हाथ ऊँची, शरीर पर श्मशान की राख, जटाएँ खुलीं, उनमें से जल नहीं, अग्नि की लपटें। गले में वासुकि फुफकार रहा था। हाथ में त्रिशूल नहीं, डमरू था। वह रौद्र था, पर सुंदर। क्रोधित था, पर अंधा नहीं।

महादेव ने सेठ की ओर नहीं देखा, पहले भीखू की ओर देखा।

"उठ, भीखू।"

भीखू काँपते हुए उठा। महादेव ने अपना हाथ बढ़ाया, और भीखू की खाली टोकरी में वही बेलपत्र रख दिए जिन्हें कल फेंका गया था, पर अब वे सूखे नहीं, हरे, ओस से भीगे।

फिर शिव मुड़े। उनकी दृष्टि सेठ पर पड़ी।

"ज्वाला प्रसाद, तूने मेरे भक्त को लात मारी। तूने सोचा मैं मंदिर में हूँ, इसलिए सुनूँगा नहीं। मूर्ख, मैं मंदिर में नहीं, भक्त के हृदय में हूँ। जब तूने उसके जल को ठोकर मारी, तूने मेरे अभिषेक को ठोकर मारी।"

सेठ गिर पड़ा। "क्षमा, प्रभु।"

शिव का स्वर बादल जैसा गूँजा। "मैं आशुतोष हूँ, शीघ्र प्रसन्न होता हूँ। पर मैं रुद्र भी हूँ। मेरा क्रोध संहार के लिए नहीं, मर्यादा के लिए है। तू धनवान है, रह। पर आज से तेरी समृद्धि का एक अंश उस वन में जाएगा जहाँ से यह भील मेरे लिए पत्ते लाता है।"

त्रिशूल जमीन पर टेका। धरती काँपी नहीं, पर सेठ के भीतर का अहंकार काँपा। उसके माथे पर भस्म की तीन रेखाएँ अपने आप उभर आईं।

शिव ने भीखू के सिर पर हाथ रखा। "तूने पचास साल माँगा नहीं। आज माँग।"

भीखू रो पड़ा। "बाबा, कुछ नहीं चाहिए। बस कल से फिर पत्ते चढ़ाने देना।"

शिव हँसे। वह हँसी डमरू से भी मधुर थी। "तथास्तु। और सुन, आज से जो भी मेरे द्वार पर आएगा, पहले नंदी के पास तेरे रखे पत्ते देखेगा, फिर सोना।"

क्रोध के बाद करुणा

आकृति धीरे धीरे लिंग में समा गई। तीसरा नेत्र बंद हुआ। मंदिर में शांति लौटी। सेठ ज्वाला प्रसाद वहीँ बैठा रहा, उसके कपड़े पसीने से भीगे, हीरे की माला टूटी।

उसने उठ कर अपने हाथों से भीखू की टोकरी उठाई, उसमें पड़े बेलपत्रों को माथे से लगाया, और नंदी की पीठ पर स्वयं रखा। फिर उसने भीखू के पैर छुए।

भीड़ स्तब्ध थी। महंत ने आगे बढ़ कर कहा, "सेठ जी..."

सेठ ने हाथ जोड़ा। "आज से मैं सेठ नहीं, सेवक हूँ।"

उस दिन के बाद काशी में दो परंपराएँ बन गईं। हर सावन में सेठ का परिवार जंगल में बेल के एक हजार पौधे लगाता है, और मंदिर के उत्तरी द्वार पर संगमरमर पर सोने से नहीं, पत्थर पर एक भील की टोकरी खुदी है।

भीखू अगले दस साल तक आया। जिस दिन उसने अंतिम साँस ली, कहते हैं मणिकर्णिका पर चिता की राख से डमरू की ध्वनि आई। उसी रात पुजारी ने गर्भगृह में देखा, शिवलिंग पर सात हरे बेलपत्र रखे थे, जबकि मंदिर के द्वार बंद थे।

शिव का क्रोध विनाश नहीं करता। वह उस क्षण प्रकट होता है जब कोई यह भूल जाता है कि भक्त की जात, उसका धन, उसका रूप नहीं देखा जाता। देखा जाता है केवल उसका प्रेम। और प्रेम का अपमान स्वयं महादेव भी सहन नहीं करते।

काशी के बूढ़े आज भी कहते हैं, आशुतोष को प्रसन्न करना सरल है, एक लोटा जल बहुत है। पर यदि तुमने उसके किसी भीखू का अपमान किया, तो याद रखना, तीसरा नेत्र बंद नहीं रहता। वह देखता है, और जब खुलता है, तो वह जलाता नहीं, वह केवल सत्य को नग्न कर देता है।

#अनिल सुधांशु 

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