प्रेत योनि से मुक्ति का सबसे सरल उपाय नारायण बलि.
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नारायण बलि के माध्यम से अकाल मृत्यु अर्थात प्रेत योनि से मृतक की आत्मा को मुक्ति मिलती है.
नारायण बलि एक विशेष हिंदू वैदिक कर्मकांड है, जो मुख्य रूप से उन पूर्वजों या परिजनों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु किसी दुर्घटना, आत्महत्या या असमय (अकाल मृत्यु) हुई हो。 इसका उद्देश्य आत्मा को 'प्रेत योनि' से मुक्त करना और परिवार को पितृ दोष से बचाना है。
घर परिवार में अकाल मृत्यु होने के दुखद परिणाम.
घर परिवार में किसी भी सदस्य कि, जब अकाल मृत्यु हो जाती है तो तरह-तरह की परेशानी और समस्याओं को सामना करना पड़ता है, जैसे पारिवारिक सदस्यों की सभी प्रकार की तरक्की उन्नति रुक जाती है, तरह-तरह असाध्य रोग लग जाते हैं, घर में व्यर्थ का लड़ाई झगड़ा रहता हैं, संतान नहीं होती, बच्चों का पढ़ाई लिखाई में मन नहीं लगता, घर की बरकत खत्म हो जाती है, परिवार के सदस्यों पर ऊपरी चक्कर दिखाई देने लगता है. चैन सुकून से नींद नहीं आती. नौकरी व्यापार चौपट हो जाता है.
नारायण बलि के मुख्य लाभ:--
पितृ दोष से मुक्ति: यह पूजा कुंडली में मौजूद गंभीर 'पितृ दोष' को समाप्त करने का सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है。
अकाल मृत्यु से शांति:--- अगर परिवार में किसी की अचानक या असामान्य मृत्यु हुई है, तो यह अनुष्ठान उनकी आत्मा को सद्गति और मोक्ष प्रदान करता है。
कल्याण और समृद्धि: --पितरों के प्रसन्न होने से घर की आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं, कार्यों में आ रही बाधाएं खत्म होती हैं और सुख-शांति बनी रहती है。
संतान प्राप्ति:-- मान्यता है कि, जिन परिवारों को संतान सुख में बाधा आ रही है, उन्हें इस पूजा से बड़ा आशीर्वाद मिलता है。
यह अनुष्ठान आम तौर पर तीन दिनों तक चलता है और भारत में इसके लिए त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र), हरिद्वार, गया और गढ़मुक्तेश्वर को सबसे पवित्र और प्रमुख स्थान माना जाता है。
“नारायण बलि” का विधान तब किया जाता है , जब कोई ज्ञात मृतक आत्मा को प्रेतत्व से मुक्ति दिलानी हो !
ज्ञात मृतक आत्मा का अर्थ है , जिसका नाम और गोत्र पता हो तथा उसके मृत्यु का कारण पता हो ! इसके अतिरिक्त जो मृतक आत्मा स्वप्न के माध्यम से बार-2 दर्शन देकर अपने मुक्ति के लिए प्रार्थना करती हो , अथवा जो स्वप्न में कष्ट में होने का संकेत देती हो , उसके निमित्त भी नारायण बलि का विधान बताया गया है !
नारायण बलि का अर्थ है की , किसी प्रेतत्व को प्राप्त ज्ञात आत्मा के निमित्त भगवान नारायण एवं उनके गण , पार्षद आदि का आवाहन , पूजन और तर्पण करना तथा उस आत्मा की मुक्ति अथवा सद्गति की प्रार्थना करना ! एक प्रकार से ” नारायण बलि ” के कर्मकांड से उस प्रेतात्मा को भगवान नारायण के चरणों में समर्पित कर देना , भगवान नारायण को बलि के रूप में प्रदान करने को ” नारायण बलि ” कहते है !
जिस आत्मा नाम , गोत्र पता हो , उसे ” ज्ञात मृतक आत्मा ” कहते है ! उनके निमित नारायण बलि , पार्वण श्राद्ध आदि किये जाते है !
यदि किसी आत्मा का अथवा हमारे अपने पूर्वजों का नाम और गोत्र पता न हो तो उनके निमित्त , उनके उध्दार अथवा तृप्ति के लिए “त्रिपिंडी श्राध्द” आदि किये जाते है ! भगवान विष्णु , भगवान ब्रह्मा , भगवान शंकर के निमित्त तीन पिंड बनाकर उनका पूजन कर , उनके निमित्त तर्पण आदि कर सभी प्रकार की दुर्गति को प्राप्त पूर्वजों की आत्माओं की सद्गति, उनके उध्दार के लिए प्रार्थना की जाती है , इसलिए इस कर्म को ” त्रिपिंडी श्राध्द ” अर्थान तीन पिंड बनाकर किया गया श्राध्द कर्म कहा जाता है !!
जैसे “त्रिपिंडी श्राद्ध” का महत्त्व है , उसी प्रकार से ” नारायण बलि ” का भी महत्त्व है ! जिसे भी अपने ज्ञात अथवा अज्ञात पूर्वजों की सद्गति करनी हो , उनको प्रेतत्व से मुक्त करना हो , उनके निमित नारायण बलि , त्रिपिंडी श्राध्द आदि कर्म करना चाहिए ! प्रत्येक गृहस्थ को अपने घर परिवार में सुख – शांति हेतु यह कर्म कराना चाहिए !
अचानक संतान कुमार्गगामी बन जाय , धन आदि की आवक रुक जाय , घर में रोग के इलाज में अधिक धन खर्च होने लगे , कन्या के विवाह में बाधा आ रही हो , पति-पत्नी में क्लेश और झगड़ें का अनायास वातावरण बनने लगे, अज्ञात रोग होने लगे , घर में अशांति और क्लेश का वातावरण बनें तो उन्हें ” श्राद्ध कर्म ” करना चाहिए !
वैसे भी किसी भी शुभ कर्म करने के पूर्व नांदी मुख श्राद्ध आदि करने का विधान शास्त्र में वर्णित है ! अतः श्राद्ध- तर्पण की क्रियाओं को जीवन का अभिन्न अंग मान लेना चाहिए और उसका पालन करना चाहिए ! एकक सुखी गृहस्थ जीवन जीने के लिए यह भी आवश्यक कर्तव्य कर्म है !
वैसे भी किसी भी शुभ कर्म करने के पूर्व नांदी मुख श्राद्ध आदि करने का विधान शास्त्र में वर्णित है ! अतः श्राद्ध- तर्पण की क्रियाओं को जीवन का अभिन्न अंग मान लेना चाहिए और उसका पालन करना चाहिए ! एकक सुखी गृहस्थ जीवन जीने के लिए यह भी आवश्यक कर्तव्य कर्म है !
नारायण बलि पूजन का महत्व :---
जो मोहग्रस्त प्रेत है, वे इस संसार से और सांसारिक सम्बन्ध में इतने मोह ग्रसित रहते है कि, उनको मरने के बाद भी न घर छोडना है और न अपने लोगो का शरीर उनको लगता है कि, मरने के बाद यही प्रेत जीवन सत्य है।
अपने ही सगे सम्बन्धियों के शरीरों मे प्रवेश किये रहते है और लोगो को परेशान करते रहते है। शरीर के साथ-2 मन, मस्तिष्क पर भी हावी रहते है।
वासनात्मक सुखभोग के लिए भी शरीरों मे प्रवेश करते है और पति पत्नी के बीच सुखमय जीवन को देख न पाने के कारण परस्पर कलह का कारण भी बन रहे है।
वर्तमान में बढते पारिवारिक कलह का एक सूक्ष्म कारण है और अवैध सम्बन्ध की ओर भी आकर्षित होने के पीछे भी इन प्रेतों की वासनात्मक भावना भी एक कारण है, जो इतनी अधिक सूक्ष्म होती है कि, बाधाग्रसित समझ भी नही पाते है।
ऐसे प्रेत अपनी मुक्ति भी नही चाहते है और ऐसे स्थान पर भी नही पहुंचने देते है, जहां इनका उध्दार हो सके। वे बाधाग्रसित व्यक्ति के मन मस्तिष्क को प्रभावित कर व्यर्थ के प्रपंचमय स्थानों पर भटकाते रहते है और शास्त्रोक्त पूजन और साधन से विमुख रखते है।
ऐसे प्रेतों का नारायण बलि जैसे पूजन के माध्यम से ही समाधान संभव हैं. बजरंग बाण एक प्रेतों पर एक प्रचण्ड प्रहार है। परन्तु नारायण बलि जैसे पूजन से ही स्थायी समाधान आता है।
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अनिल सुधांशु
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