योग्य एवं गुणवान पुत्र के लिए करें भगवान सूर्य देव की साधना.

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गुणवान. चरित्रवान. मेधावी एवं सर्वगुणसंपन्न सुन्दर स्वस्थ और निरोग पुत्र के लिए भगवान सूर्य देव की साधना की जाती है.

 गुणवान. चरित्रवान. मेधावी एवं सर्वगुण संपन्न. सुन्दर स्वस्थ और निरोग पुत्र के लिए भगवान सूर्य देव की साधना की जाती है. इसमें किसी प्रकार का कोई संशय नहीं है. इसका सबसे बड़ा प्रमाण भगवान सूर्य देव के अति तेजस्वी पुत्र हैं. जिनमें सूर्यपुत्र शनिदेव कर्ण और धर्मराज का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है. जिनकी योग्यता बल और न्याय से, दान से पूरी दुनिया परिचित है. प्रत्येक माता-पिता की इच्छा होती है, उनको ऐसे ही पुत्र प्राप्त हो, जो अपने साथ-साथ उनका भी नाम रोशन करें,  लेकिन इसके लिए जप तप और साधना की आवश्यकता होती है. और भगवान भास्कर की साधना आपकी यह मनोकामना पूर्ण करने में पूरी तरह से सक्षम है.

आदित्यं च शिवं विद्याच्छिवमादित्यरूपिणाम्।
उभयोरन्तरं नास्ति ह्यादित्यस्य शिवस्य च।।
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च रूद्र एव हि भास्करः।
त्रिमूर्त्यात्मा त्रिवेदात्मा सर्वदेवमयो रविः।।

सूर्य एवं शिव में कोई भेद नहीं है. क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु व रूद्र तीनों देव स्थित हैं। सूर्य हमारे प्रत्यक्ष देवता है।

ज्योतिष और सूर्य-

सूर्य के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है.

 सूर्य ही वह परम तत्व है, जो कि संसार के समस्त तेज, दीप्ति और कान्ति के निर्माता तथा इस जगत की आत्मा कहे गये हैं, सूर्य ही वह विराट पुरूष आदि देव हैं, जिनकी साधना-उपासना से समस्त रोग, नेत्र-दोष और ग्रह-बाधा दूर होती है, क्योंकि सूर्य अपनी शक्ति न केवल पृथ्वी को अपितु चन्द्र, मंगल, बुध, गुरू, शुक्र, शनि आदि को भी उचित मात्र में प्रदान कर इस सृष्टि का संचालन करते हैं।

सूर्य को आत्मकारक ग्रह माना गया है।

 सूर्य ग्रहराज हैं और कभी वक्री नहीं होते, सदैव मार्गी ही रहते हैं, सिंह राशि के स्वामी हैं और स्थिर स्वभाव के, क्षत्रिय वर्ण, विद्या, व्यक्ति, तेज, प्रभाव, स्वाभिमान के कारक ग्रह हैं, सूर्य के चन्द्र, मंगल, बृहस्पति मित्र ग्रह तथा शुक्र, शनि शत्रु ग्रह हैं, सूर्य सभी ग्रहों के दोष-प्रभाव का शमन कर सकते हैं।

सूर्य उपासना-सूर्य के सम्बन्ध में शास्त्रों में इतना अधिक महत्व एवं साहित्य लिखा है, कि इस लेख में वह सब वर्णन करना सम्भव ही नहीं है, क्योंकि सूर्य प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को प्रभावशाली तथा रोग रहित शरीर के साथ-साथ व्यक्ति की इन्द्रियों को तीव्र प्रभावयुक्त बनाने में सक्षम होता है, व्यक्ति की वाणी में ज्ञान और आकर्षण देने हेतु सूर्य की साधना उपासना आवश्यक है।

सूर्य ही समस्त जगत का प्रकाशक एवं आत्मा है.

 उसकी सभी किरणें ज्ञात-अज्ञात पदार्थों में जीवन प्रदान करती हैं और सभी वनस्पतियां सूर्य के कारण ही मनुष्य के लिये योग्य हैं, इसीलिये सूर्य की उपासना का महत्व है, सूर्य साकार स्वरूप है, जिसे सभी पूजन में सर्व-प्रथम अर्घ्य अर्पित किया जाता है, इसके पश्चात् ही दूसरे देवी-देवताओं का पूजन किया जाता है।

जिस व्यक्ति में सूर्य तत्व समाप्त हो जाता है, वह व्यक्ति जीवन में एक व्यक्तित्वहीन कीड़े के समान है.

 जिसके जीवन का कोई महत्व ही नहीं है और न ही वह व्यक्ति अपने जीवन में कुछ कर सकता है। सूर्य में जितनी रोगनाशक शक्ति है, वह संसार के किसी अन्य पदार्थ में नहीं है।

 भगवान सूर्य देव की तेजस्वी पुत्रदा साधना:--

पुत्रदा एकादशी पर्व का सबसे अधिक महत्वपूर्ण स्वरूप सूर्य साधना है.

 सूर्य के बिना किसी भी वस्तु के दृश्य-अदृश्य की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इस दिन साधक प्रातः सूर्योदय से पहले उठकर स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण करें, सूर्य की ओर मुंह कर सूर्य नमस्कार करें, एक ताम्र पात्र में पुष्पों के साथ तीन अर्घ्य अर्पित करें।

अपने सामने सूर्य शक्ति युक्त सिद्ध एवं मंत्रों से अभिमंत्रित पुत्र प्राप्ति यंत्र को स्थापित कर उस पर चन्दन, केसर, सुपारी तथा लाल पुष्प अर्पित कर इसके साथ ही गुलाल तथा कुंकुम के साथ-साथ सिन्दूर भी अर्पित करें और अपने सामने सिन्दूर को शुद्ध जल में घोल कर दोनों ओर सूर्य चित्र बनाये तथा पुष्पांजलि अर्पित करते हुये प्रार्थना करें-

-- ‘हे आदित्य! आप सिन्दूर वर्णीय, तेजस्वी मुख मण्डल, कमल नेत्र स्वरूप वाले ब्रह्मा, विष्णु तथा रूद्र सहित सृष्टि के मूल कारक हैं, आपको इस साधक का नमस्कार! आप मेरे द्वारा अर्पित कुंकुम, पुष्प, सिन्दूर एवं चन्दनयुक्त जल का अर्घ्य ग्रहण करें।’

••• सूर्य शक्ति युक्त पुत्र प्राप्ति यंत्र पर कुंकुम से बारह स्वरूपों का स्मरण करते हुये 12 बिन्दियां लगायें। जो सूर्य के 12 स्वरूप हैं, तत्पश्चात् पूर्व दिशा की ओर मुंह कर ‘सूर्य शक्ति युक्त पुत्र प्राप्ति यंत्र पर केसर, कुंकुम से अपने ललाट पर तिलक कर पुत्रदा प्राप्ति मंत्र की 11 माला, सूर्य शक्ति तेजस्वी माल मंत्र जप करें।

मंत्र:--

।। ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः तेजस्वी पुत्रदा सूर्याय नमः।।

मंत्र जप पूर्ण होने पर गुरू आरती सम्पन्न कर गुरूदेव से साधना में सफलता का आशीर्वाद प्राप्त करें। साधना समाप्ति के पश्चात् माला और यंत्र को किसी दिन गुरू चरणों में अर्पित कर दें।

सूर्य देव का हवन कैसे करें?

सूर्य का हवन मुख्य रूप से स्वास्थ्य, ऊर्जा, तेज और ग्रह दोषों की शांति के लिए किया जाता है。इसे घर पर या किसी योग्य पंडित की सहायता से किया जा सकता है। यहाँ सूर्य देव के हवन की चरणबद्ध विधि दी गई है: 

आवश्यक सामग्री:--

हवन कुंड:-- तांबे या मिट्टी का।

समिधा: आम की लकड़ी और सूर्य के लिए विशेष रूप से 'आक' (मदार) की लकड़ी。

हवन सामग्री:-- काले तिल, जौ, गुग्गुल, चावल, कमल के फूल, और घी。

अन्य:-- तांबे का लोटा, रोली, लाल चंदन, लाल फूल, कपूर और धूप। 

1. तैयारी और शुद्धि:--

रविवार की सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें।

पूर्व दिशा की ओर मुख करके साफ आसन पर बैठें。 

आचमन करें (हाथ में जल लेकर 'ॐ केशवाय नमः', 'ॐ नारायणाय नमः', 'ॐ माधवाय नमः' कहकर जल पिएं और हाथों को धोएं)। 

2. संकल्प लें:--

हाथ में जल, अक्षत (चावल), और कुछ सिक्के लेकर अपने नाम, गोत्र और हवन के उद्देश्य (जैसे- उत्तम स्वास्थ्य, नौकरी या ग्रह शांति) का उच्चारण करते हुए संकल्प लें और जल को भूमि पर छोड़ दें।

3. अग्नि प्रज्वलित करना:-*

हवन कुंड में कपूर और आम की लकड़ियों की मदद से अग्नि प्रज्वलित करें। 

4. देवताओं का आवाहन:--

सर्वप्रथम अग्नि देव और अपने इष्ट देवता को घी की आहुति दें।

5. सूर्य देव के मंत्रों से आहुति:-*

हवन सामग्री और घी को मिलाकर मिश्रण तैयार करें।

सूर्य देव के मूल मंत्र या गायत्री मंत्र का जाप करते हुए आहुति दें। आप निम्नलिखित मंत्रों का उपयोग कर सकते हैं:--

मंत्र : ॐ घृणि सूर्याय नमः स्वाहा.

मंत्र : ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ स्वाहा.

इन मंत्रों का 108 बार उच्चारण करते हुए अग्नि में एक-एक आहुति डालें。 

6. पूर्णाहूति--

सभी मंत्रों के जाप के पश्चात अंत में पान के पत्ते पर बताशा, सूखा मेवा, लौंग, इलायची और घी रखकर पूर्णाहूति दें

 और "ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते स्वाहा॥" बोलें।

7. आरती और क्षमा प्रार्थना:--

हवन के बाद कपूर या दीपक से सूर्य देव की आरती करें।
अंत में हाथ जोड़कर त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

विशेष ध्यान रखने योग्य बातें:

प्रत्येक मंत्र के अंत में 'स्वाहा' का उच्चारण करते समय ही आहुति (सामग्री) को अग्नि में डालें, हवन के दौरान अपना मुख सदैव पूर्व दिशा की ओर रखें。हवन समाप्त होने के बाद बची हुई विभूति (राख) को माथे पर लगाएं।

°°°. सूर्य का मूल व बीज मंत्र (सबसे लोकप्रिय)नियमित जाप या सूर्य को जल अर्पित करने के लिए यह सबसे उत्तम मंत्र है।
ॐ घृणि सूर्याय नमः ॥

°°° सूर्य बीज मंत्र (शक्ति और तेज के लिए)यह सूर्य देव का अत्यंत शक्तिशाली बीज मंत्र है।ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः ॥
°°° सूर्य गायत्री मंत्र (बुद्धि और सफलता के लिए)स्वास्थ्य, यश और ज्ञान प्राप्ति के लिए यह सर्वश्रेष्ठ मंत्र है।ॐ आदित्याय विद्महे दिवाकराय धीमहि। तन्नो सूर्यः प्रचोदयात् ॥
°°°  द्वादश (12) सूर्य मंत्र (द्वादशी नाम)सूर्य देव के इन 12 नामों का जाप करने से शारीरिक और मानसिक शक्ति बढ़ती है।

ॐ मित्राय नमः,ॐ रवये नमः,ॐ सूर्याय नमः,ॐ भानवे नमः,ॐ खगाय नमः,ॐ पूषणे नमः,ॐ हिरण्यगर्भाय नमः,ॐ मरीचये नमः,ॐ आदित्याय नमः,ॐ सवित्रे नमः,ॐ अर्काय नमः,ॐ भास्कराय नमः,

सूर्य पूजा के सामान्य नियम:--सूर्य देव को अर्घ्य देते समय (जल चढ़ाते समय) तांबे के पात्र का प्रयोग करें।जल में लाल फूल, चावल और थोड़ा कुमकुम मिलाना शुभ माना जाता है, इन मंत्रों का शुद्ध उच्चारण करते हुए प्रतिदिन 108 बार जाप करना सबसे फलदायी होता है।

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 अनिल सुधांशु
 ज्योतिषाचार्य
°°° नीम करोली आश्रम कैंची धाम नैनीताल (उत्तरांचल) °°°°° बाबा बालक नाथ मंदिर, किला, बरेली (उ0 प्र0)

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