विष योग जीवन में मृत्यु के सामान कष्ट देता है.
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विष योग, जीवन को जहर के समान बना देता है, आदमी को कदम कदम पर दुर्भाग्य और मुसीबतों का सामना करना पड़ता है.
कई बार इस योग के कारण व्यक्ति मानसिक रूप से डिस्टर्ब हो जाता है और पागलपन जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है, ऐसे जातक के अंदर बहम की स्थिति बनी रहती है, वह सही से निर्णय नहीं ले पता क्या करें, क्या ना करें, किसी पर विश्वास नहीं करता. अगर कोई उसके भले की बात करता है, तब भी उसे बुरा लगता है और उसे अपना दुश्मन मानने लगता है.
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, विष योग जीवन को मृत्यु से बदतर बना देता है.
जिनकी कुंडली में विष योग बन जाता है, उसके जीवन बहुत ही कष्टकारी हो जाता है, ऐसा जातक यदि सोने को भी हाथ लगाए तो, मिट्टी हो जाता है, जीवन में बहुत मुश्किल से सफलता मिलती है और जो सफलता मिलती है वह जातक की योग्यता के अनुसार नहीं होती, जातक लाख योग्यता होने के बाद भी कामयाब नहीं हो पाता, पैसे पैसे के लिए ऐसा जातक मोहताज हो जाता है कर्ज बढ़ जाता है कई बार जीवन में आत्महत्या करने जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है लेकिन यहां यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि विश्व योग हमेशा खराब नहीं होता कभी-कभी विशेष परिस्थितियों में ग्रहों के अनुसार यह जातक को रंग से राजा भी बना देता है.
मृत्यु तुल्य कष्ट देता है विष-योग।
यह योग मृत्यु, भय, दुख, अपमान, रोग, दरिद्रता, दासता, बदनामी, विपत्ति, आलस और कर्ज जैसे अशुभ योग उत्पन्न करता है, हमेशा पैसे की समस्या रहती है, ऐसे जातक के पास पैसा नहीं रुकता आमदनी से ज्यादा खर्च होता है, तथा इस योग से जातक (व्यक्ति) नकारात्मक सोच से घिरने लगता है, जीवन में कई बार आत्महत्या जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, इस योग का सबसे ज्यादा प्रभाव जातक के करियर और वैवाहिक जीवन पर पड़ता है और उसके बने बनाए कार्य भी काम बिगड़ने लगते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिस व्यक्ति की कुंडली में विष कुंभ योग होता है, उसे कदम-कदम पर समस्याओं का सामना करना पड़़ता है, कई मामलों में सफलता मिलते-मिलते रह जाती है।
ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा व शनि की युति से बनने वाले योग को विष योग कहते हैं। यदि इनके बीच दृष्टि संबंध भी हो तो यह योग होता है। चंद्रमा मन का कारक होता है व शनि शरीर में अलग भागों में दर्द का कारक होता है। यदि कुंडली में शनि व चंद्र दोनों ही मारक हैं, या कारक होने के बावजूद त्रिक भाव में बैठे हैं तो भी यह योग काम करता है।
शनि-चंद्र मारक होकर जिस घर में युति बनाएंगे।
वैसे तो सभी कुंडलियों में इसका प्रभाव खतरनाक होता है, लेकिन विशेष रूप से, वह उस घर से संबंधित रोग देते है। सिंह व धनु लग्न के जातकों को यह योग विशेष प्रभावित करता है। यदि चंद्र व शनि युति बनाकर व दोनों 10 से 22 डिग्री तक हैं तो, यह योग जातक को बहुत गंभीर रोग दे सकता है।
अलग-अलग घरों में बिष योग का प्रभाव।
यह योग प्रथम भाव में हमारे स्नायु तंत्र को प्रभावित करता है।
दूसरे भाव में यह युति दांत व दाहिनी आंख को प्रभावित करता है।
तीसरे घर में यह गला, दायां कान व गर्दन पर प्रभाव देता है।
चौथे घर में छाती, फेफड़े और दिल पर असर करता है।
पंचम भाव में गर्भाशय, हमारे पाचन-तंत्र को प्रभावित करता है। छठे घर में आंतों से संबंधी रोग, दुर्घटना, चोट का खतरा रहता है। सप्तम भाव में मूत्र मार्ग व गर्भाशय को प्रभावित करता है।
अष्टम भाव में जननांग रोग व मृत्यु तुल्य कष्ट देता है। नवम भाव में यह योग कूल्हे, जांघ व भाग्य पर दुष्प्रभाव होता है, दशम भाव में काम-धंधा, घुटना व जोड़ों में दर्द प्रभावित होते हैं, एकादश भाव में बायां कान व घुटने से नीचे व आय प्रभावित होती है। द्वादश भाव में नींद न आना व डिप्रेशन, हॉस्पिटल के बिल व जेल जाने का योग भी बनता है।
उपाय विष योग से बचने के लिए शनि व चंद्र के बीज मंत्र का जाप व दान आवश्यक हैं।
चंद्र व शनि के सात रत्न अभिमंत्रित कराकर प्रवाहित करें। घायल कुत्ते व गाय का उपचार कराएं। कोढ़ी, अपंग, बेसहारा की मदद करें। सत्य बोलें व सफेद चीजों का दान करें।
कुंडली में शनि और चंद्रमा की युति या दृष्टि से बनने वाले 'विष योग' को आमतौर पर एक अशुभ और मानसिक तनाव देने वाला योग माना जाता है。
लेकिन ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, संघर्षों और चुनौतियों के अलावा इसके कई छिपे हुए फायदे भी होते हैं。
विष योग के मुख्य फायदे और सकारात्मक पहलू निम्नलिखित हैं:---
उच्च स्तर की आध्यात्मिकता : -- इस योग में मन (चंद्रमा) को शनि द्वारा पीड़ित किया जाता है। इससे व्यक्ति का सांसारिक मोहभंग होता है और वह सत्य की खोज में आगे बढ़ता है。 कई बड़े संत और दार्शनिक इसी योग के प्रभाव से अध्यात्म की ऊंचाइयों को छूते हैं।
गहरी अंतर्ज्ञान और रहस्यमयी शक्तियां :--- विष योग वाले जातकों के पास छठी इंद्रिय बहुत मजबूत होती है。
उन्हें भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान हो जाता है, इसके प्रभाव से वे गुप्त विद्याओं (जैसे ज्योतिष या तंत्र) में बहुत निपुण हो सकते हैं。
मजबूत सहनशीलता और धैर्य:-- शनि और चंद्रमा का यह मेल व्यक्ति को जीवन में बहुत सारे संघर्ष और उतार-चढ़ाव देता है, इस कारण जातक के अंदर असाधारण धैर्य, सहनशीलता और विपरीत परिस्थितियों में डटे रहने की क्षमता विकसित हो जाती है。
गहन अनुसंधान और विश्लेषण :-- यह योग जातक को एक बेहतरीन शोधकर्ता , दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक या रणनीतिकार बना सकता है, ऐसे लोग किसी भी विषय की तह तक जाकर सोचते हैं और तार्किक रूप से मजबूत होते है。
जन्मस्थान से दूर बड़ी सफलता:-- जिन लोगों की कुंडली में यह योग होता है, वे यदि अपने जन्मस्थान या परिवार से दूर (विशेषकर विदेश में) जाकर बसते हैं, तो उन्हें भौतिक जीवन में बहुत नाम और धन कमाने का अवसर मिलता है。
***अपने पूजा स्थल पर सिद्ध शनि यंत्र और चंद्र यंत्र रखें और मंत्रों से अभिमंत्रित एवं सिद्ध करके गले में धारण करें, और उसकी नियम पूर्वक पूरे विधि विधान से पूजा करें तो, हर सोमवार को भगवान शिव का दूध से अभिषेक करें और पूर्णमासी का नियम अनुसार व्रत रखें, इससे आपको लाभ होगा।
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अनिल सुधांशु
ज्योतिषाचार्य
*** नीम करोली आश्रम कैंची धाम नैनीताल( उत्तरांचल)
°°° बाबा बालक नाथ मंदिर किला बरेली (उत्तर प्रदेश)
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