केतू आध्यात्म बैराग्य मोक्ष रहस्य और पूर्व जन्म का कारक होता है।
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केतु आध्यात्म बैराग्य मोक्ष रहस्य और पूर्व जन्म का कारक माना जाता है।
वैदिक ज्योतिष में केतु को मुख्य रूप से मोक्ष, आध्यात्मिकता, वैराग्य, अलगाव, रहस्य, और पूर्व जन्म के कर्मों का कारक माना जाता है। केतु व्यक्ति को भौतिक सुखों से दूर कर आत्मज्ञान और अंतर्ज्ञान की ओर ले जाता है। यह तांत्रिक विद्या, शोध और असाधारण मानसिक शक्तियों का भी प्रतिनिधित्व करता है।
केतु से जुड़े मुख्य कारक और प्रभाव:--
आध्यात्मिक विकास:--केतु वैराग्य और आत्मचिंतन को बढ़ावा देता है, जिससे व्यक्ति सांसारिक जीवन से विरक्त होने लगता है।
मोक्ष और मुक्ति: ---इसे जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति यानी मोक्ष का कारक माना गया है।
पूर्व जन्म के कर्म:-- केतु को 'ड्रैगन टेल' भी कहते हैं, जो पिछले जन्मों के अधूरे कार्यों और कर्मों के फल को दर्शाता है।
रहस्य और तांत्रिक विद्या:--- केतु तांत्रिक क्रियाओं, गुप्त विज्ञान, जादुई शक्तियों, और अनजाने भय का कारक है।
विदेश यात्रा और अचानक बदलाव: केतु को अनपेक्षित घटनाओं, अचानक बदलाव और विदेश यात्रा का कारक भी माना जाता है।
शरीर पर प्रभाव:--- ज्योतिष के अनुसार केतु को मानसिक विक्षोभ, भेदभाव, और शरीर में गुप्त बीमारियों का कारण भी माना जाता है।
केतु कवच चमत्कारी रूप से शक्तिशाली स्तोत्र है जो केतु ग्रह को समर्पित है। ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से बात करें तो केतु एक छाया ग्रह है जिसका कुंडली पर बहुत प्रभाव पड़ता है। पौराणिक आख्यान के अनुसार भगवान विष्णु ने जब समुद्र मंथन के दौरान चक्र से दैत्य का सर काटा तो सर राहु बना जबकि धड़ केतु के नाम से जाना गया है। केतु कवच केतु ग्रह को प्रसन्न करने का उत्तम उपाय है। जन्म-कुंडली में वे सदैव एक-दूसरे के सप्तम स्थान पर रहते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस ग्रह के अधिदेवता चित्रकेतु और प्रत्यधिदेवता ब्रह्मा जी हैं। केतु की शान्ति के लिए उपाय-स्वरूप केतु कवच स्तोत्र को पढ़ने का विधान है।
अस्य श्रीकेतुकवचस्तोत्रमंत्रस्य त्र्यंबक ऋषिः।
अनुष्टप् छन्दः। केतुर्देवता। कं बीजं। नमः शक्तिः।
केतुरिति कीलकम् I केतुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः॥
केतु करालवदनं चित्रवर्णं किरीटिनम्।
प्रणमामि सदा केतुं ध्वजाकारं ग्रहेश्वरम् ॥१॥
चित्रवर्णः शिरः पातु भालं धूम्रसमद्युतिः।
पातु नेत्रे पिंगलाक्षः श्रुती मे रक्तलोचनः ॥२॥
घ्राणं पातु सुवर्णाभश्चिबुकं सिंहिकासुतः।
पातु कंठं च मे केतुः स्कंधौ पातु ग्रहाधिपः ॥३॥
हस्तौ पातु श्रेष्ठः कुक्षिं पातु महाग्रहः।
सिंहासनः कटिं पातु मध्यं पातु महासुरः ॥४॥
ऊरुं पातु महाशीर्षो जानुनी मेSतिकोपनः।
पातु पादौ च मे क्रूरः सर्वाङ्गं नरपिंगलः ॥५॥
य इदं कवचं दिव्यं सर्वरोगविनाशनम्।
सर्वशत्रुविनाशं च धारणाद्विजयि भवेत् ॥६॥
॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे केतुकवचं सम्पूर्णम् ॥
अर्थ:---
मैं हमेशा केतु को नमस्कार करता हूं, जिसका चेहरा भयावह है, जो कई रंगों का है, जिसके पास मुकुट है, जिसका आकार ध्वज के समान है और वह ग्रहों का स्वामी है।
वह बहुरंगा मेरे सिर की रक्षा करे, मेरे बालों की रक्षा वह करे जो धुआँ पैदा करता है।मेरी आंखों की रक्षा लाल भूरी आंखों वाले द्वारा की जाए, और मैं जो सुनूं वह लाल रक्त आंखों वाले द्वारा संरक्षित किया जाए।
मेरी गंध की रक्षा उसके द्वारा की जाए जो सोने की तरह चमकता है, मेरी ठुड्डी की रक्षा सिंहिका के पुत्र द्वारा की जाए, मेरी गर्दन और पैरों की रक्षा केतु द्वारा की जाए, और ग्रहों के स्वामी मेरे कंधे की रक्षा करें।
मेरी भुजाओं की रक्षा देवों के प्रमुख द्वारा की जाए, महान ग्रह मेरे पेट की रक्षा करें, मेरे कूल्हे की रक्षा उसके द्वारा की जाए जो सिंहासन पर बैठा है, और महान असुर मेरे मध्य की रक्षा करें।
मेरी जाँघों को महान सिर द्वारा संरक्षित किया जाए, मेरे घुटनों को उसके महान क्रोध द्वारा संरक्षित किया जाए, मेरे पैरों को क्रूर द्वारा संरक्षित किया जाए, और मेरे सभी शरीर के अंगों को लाल-भूरे भगवान द्वारा संरक्षित किया जाए।
यह पवित्र कवच सभी रोगों को नष्ट करता है, सभी शत्रुओं का नाश करता है और एक बार धारण करने पर यह आपको विजयी बना देगा।
केतु कवचम के क्या फायदे हैं?
केतु भस्म कवच अपने असाधारण लाभों के लिए प्रसिद्ध है, जो किसी व्यक्ति की ज्योतिषीय कुंडली में केतु से जुड़े प्रतिकूल प्रभावों को कम करने में सहायक होता है। ऐसा माना जाता है कि, यह नकारात्मक प्रभावों से बचाव करता है, आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देता है और स्पष्ट सोच को प्रोत्साहित करता है।
केतु कौन सा रोग देता है?
केतु के कुपित होने से रोग और ...
केतु ग्रह से होने वाले रोगों में अक्सर रहस्यमयी, जटिल और ठीक न होने वाली बीमारियाँ शामिल होती हैं, जैसे त्वचा रोग (सोरायसिस, हर्पीस), रक्त विकार, मूत्र संबंधी समस्याएँ, तंत्रिका संबंधी विकार (कंपन, ऐंठन), एलर्जी, चोटें, और मानसिक समस्याएँ (भ्रम, अकेलापन), साथ ही यह कान, घुटने, जोड़ों और रीढ़ की हड्डी में भी समस्याएँ दे सकता है, जिनका निदान और उपचार मुश्किल होता है।
केतु से संबंधित प्रमुख रोग और लक्षण:--
त्वचा और रक्त: हर्पीस, सोरायसिस, ल्यूकोडर्मा, एलर्जी, रक्त दोष (विचित्र या ठीक न होने वाले)।
पेशाब और मूत्र प्रणाली: मूत्र संबंधी लगातार समस्याएँ, किडनी और प्रोस्टेट की समस्याएँ, तंत्रिका और तंत्रिका तंत्र: कंपन, ऐंठन, तंत्रिका क्षति (न्यूरोपैथी), मिर्गी, नींद न आना, सिर दर्द।
शारीरिक और चोटें: -- शरीर में चोट लगना, घाव, कुत्ते का काटना, जोड़ों और हड्डियों (घुटने, रीढ़) में समस्याएँ, मांसपेशियों में कमजोरी, मानसिक और भावनात्मक, भ्रम, अकेलापन, अनिश्चितता, नकारात्मक विचार, काल्पनिक बीमारियों का डर, एकाग्रता में कमी।
अन्य:--- बाल झड़ना, थकान, सुस्ती, संक्रमण (वायरल रोग), मधुमेह (संभावित), आग से जलने का भय।
क्यों होती हैं ये समस्याएं ?
केतु को रहस्यमयी और अप्रत्याशित बीमारियों का कारक माना जाता है, जिनके मूल कारण और उपचार को समझना कठिन होता है,ज्ञयह अक्सर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करता है, जिससे व्यक्ति एलर्जी और संक्रमण के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
केतु किस चीज से खुश होता है?
केतु ग्रह को प्रसन्न करने के लिए आध्यात्मिक कार्य, दान (जैसे तिल, कंबल, उड़द), कुत्तों और गायों की सेवा, भगवान गणेश और भैरव जी की पूजा, और 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः केतवे नमः' मंत्र का जाप जैसे उपाय किए जाते हैं, जिससे उसके अशुभ प्रभाव कम होते हैं और शुभ फल प्राप्त होते हैं।
केतु खराब होने के क्या लक्षण हैं?
केतु खराब होने से बीमारी :- केतु खराब होने पर जातक को सबसे पहले पेशाब से संबंधित बीमारी होगी, जातक को संतान उत्पत्ति मैं समस्या होती है या जातक की संतान बार बार खत्म हो जाती है, केतु खराब होने पर जातक के बाल झड़ने लगते हैं।
केतु देवता के मंत्र:--
केतु बीज मंत्र:--- ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः।
सरल केतु मंत्र: ---ॐ कें केतवे नमः।
केतु गायत्री मंत्र: ---ॐ धूम्र वर्णाय विद्महे कपोत वाहनाय धीमहि, तन्नो केतुः ---प्रचोदयात्।
पौराणिक मंत्र: ---ॐ पलाश पुष्प सकाशं तारका ग्रह मस्तकम्। रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्।
वैदिक मंत्र:--- ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्य्याऽपेशसे। समुषभ्दिरजायथाः।
जाप नियम और उपाय:--
मंत्रों का जाप शनिवार के दिन रुद्राक्ष की माला से करना चाहिए, कलह, रोग और नकारात्मकता को दूर करने के लिए केतु के बीज मंत्र का जाप सर्वोत्तम है, इन मंत्रों का 17,000 बार (कलयुग में 68,000 बार) जाप करने से अधिक लाभ मिलता है।
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अनिल सुधांशु
ज्योतिषाचार्य
नीम करौली आश्रम कैंची धाम नैनीताल (उत्तरांचल)
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