सिद्ध तांत्रिकों के लिए कुछ भी असंभव नहीं होता.
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क्या हर तांत्रिक की अधोगति होती है? — शास्त्र वास्तव में क्या कहते हैं?
लोग तांत्रिकों को बुरा व्यक्ति समझते हैं, लेकिन वो यह नहीं जानते कि, तंत्र का मतलब है, तीर सीधा निशाने पर लगना, क्योंकि जो भी सिद्ध तांत्रिक होता है, उसके लिए अच्छा या बुरा कुछ भी संभव नहीं होता, वह अपने शक्ति से कुछ भी करने में समर्थ होता है, इसीलिए कहा जाता है कि, तांत्रिकों से किसी भी मुद्दे पर व्यर्थ में बहस नहीं करना चाहिए, क्योंकि तांत्रिकों को चुनौती देने का मतलब है, अपने खुद के लिए परेशानी खड़ी करना और परेशानी किस रूप में पीछें लग जाए, इसकी कोई शर्त नहीं है.
यदि तांत्रिक लोगों की परेशानियों को दूर करता है और अपनी साधना को लोगों की भलाई में लगता है तो, उसे नरक कि, नहीं, स्वर्ग की प्राप्ति होती है. क्योंकि दुनिया की भलाई करने वालों का कभी बुरा नहीं होता.
** कई बार सिद्धू तंत्र को की कृपा दृष्टि से बड़ी से बड़ी घातक बीमारी पलक झपकते गायब हो जाती है, जिसको कभी संतान होने की कोई आशा न हो उसके संतान हो जाती है, क्योंकि तांत्रिकों को मां शक्ति और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है, और वह उन्हीं के अधीन रहकर, उनकी इच्छा से कार्य करते हैं.
अगर किसी के प्राणों पर संकट आ जाए, कोई ऐसी गंभीर बीमारी लग जाए या कोई ऐसा दुश्मन उसके पीछे लग जाए, जो उसके प्राण लेकर ही मानें तो, उसे रोकने के लिए तंत्र क्रिया करना बरा काम नहीं है, ऐसे में उसकी जान बचाना सबसे बड़ा पुण्य का काम है.
कई बार लोग दूसरों के लिए मारण क्रिया का सहारा लेते हैं, लेकिन यहां पर यह देख लेना आवश्यक होता है कि, मारण क्रिया के पीछे असली सच्चाई क्या है, वह अपने लिए या दूसरों के लिए इसका प्रयोग क्यों करना चाहता है, क्योंकि कई बार आत्मा प्रतिशोध लेती है और वह नहीं चाहती कि, मारण क्रिया के द्वारा उसे संसार से मुक्त कर दिया जाए, मृत आत्मा चाहती है कि, ऐसे व्यक्ति को अपने कर्मों की सजा मिले और कठोर से कठोर दंड मिलें, ताकि दुनिया देखे बुरा करने वालों का हमेशा बुरा ही होता है.
** समाज में प्रायः यह धारणा है कि, तंत्र का मार्ग अपनाने वाला प्रत्येक व्यक्ति अंततः पतन को प्राप्त होता है। लेकिन क्या हमारे शास्त्र भी यही कहते हैं? उत्तर है— नहीं।
*** सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि "तंत्र" और "काला जादू" एक ही चीज़ नहीं हैं। तंत्र भारतीय सनातन परंपरा की एक प्राचीन साधना-पद्धति है, जिसका उल्लेख अनेक आगम, तंत्रग्रंथों तथा शाक्त, शैव और वैष्णव परंपराओं में मिलता है। इसका मूल उद्देश्य साधक की आध्यात्मिक उन्नति, देवोपासना, मंत्र-सिद्धि और अंततः ईश्वर की प्राप्ति है।
🏵️भगवान शिव को अनेक तंत्रों का प्रवर्तक माना गया है, जबकि माता आदि शक्ति तांत्रिक उपासना की अधिष्ठात्री मानी गई हैं। इसलिए केवल "तंत्र" शब्द सुनकर उसे अधर्म मान लेना शास्त्र सम्मत नहीं है।
** समस्या तंत्र में नहीं, बल्कि उसके दुरुपयोग में है।
** जब कोई व्यक्ति तांत्रिक शक्तियों का उपयोग दूसरों को कष्ट पहुँचाने, मारण, विद्वेष, छल, स्वार्थ, अहंकार या अनुचित लाभ के लिए करता है, तब वह धर्म से विचलित हो जाता है। ऐसे कर्मों के लिए कर्मफल का सिद्धांत उतना ही लागू होता है जितना किसी अन्य अधार्मिक कर्म पर। शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि अधर्म से प्राप्त शक्ति अंततः साधक के पतन का कारण बनती है।
++ इसके विपरीत, जो साधक गुरु के मार्गदर्शन में, शास्त्रीय मर्यादा का पालन करते हुए, आत्मसंयम, भक्ति और लोककल्याण की भावना से तंत्र-साधना करता है, उसके लिए तंत्र भी मोक्ष का एक साधन बन सकता है।
इसलिए यह कहना कि "हर तांत्रिक की अधोगति होती है" शास्त्र सम्मत नहीं है। सही कथन यह है कि—
** अधोगति तंत्र से नहीं, बल्कि अधर्म, दुरुपयोग, अहंकार और स्वार्थ से होती है।
सनातन धर्म का मूल सिद्धांत भी यही है—
** "विद्या वही कल्याणकारी है, जिसका उपयोग धर्म और लोकमंगल के लिए किया जाए।"
🙏🙏🙏 अतः किसी भी तांत्रिक या तंत्र-साधना का मूल्यांकन उसके बाहरी रूप से नहीं, बल्कि उसके आचरण, उद्देश्य, गुरु-परंपरा और धर्मपालन के आधार पर करना चाहिए।
*** तंत्र स्वयं न शुभ है, न अशुभ। उसका स्वरूप साधक की नीयत, मर्यादा और कर्मों से निर्धारित होता है। धर्मयुक्त तंत्र साधना आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग बन सकती है, जबकि अधर्मयुक्त तंत्र का दुरुपयोग साधक के पतन का कारण बन सकता है।
>अनिल सुधांशु
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