अपने पूर्वजों का श्राद्ध न करने के नुकसान.
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श्राद्ध न करने से सभी प्रकार की तरक्की उन्नति वंश वृद्धि रुक जाती है और दुखों के अम्वार लग जाते हैं, भयंकर दुख उठाने पड़ते हैं।
शास्त्रों में श्राद्ध न करने से होने वाली हानियों का जो वर्णन किया गया है, उन्हें जानकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। शास्त्रों में मृत व्यक्ति के दाहकर्म के पहले ही पिण्ड-पानी के रूप में खाने-पीने की व्यवस्था कर दी गई है। यह तो मृत व्यक्ति की इस महायात्रा में रास्ते के भोजन-पानी की बात हुई। परलोक पहुंचने पर भी उसके लिए वहां न अन्न होता है और न पानी। यदि सगे-संबंधी भी अन्न-जल न दें तो भूख-प्यास से उसे वहां बहुत ही भयंकर दु:ख होता है।
आश्विन मास के पितृपक्ष में पितरों को यह आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें अन्न-जल से संतुष्ट करेंगे, यही आशा लेकर वे पितृलोक से पृथ्वी लोक पर आते हैं, लेकिन जो लोग पितर हैं ही कहां? यह मानकर उचित तिथि पर जल व शाक से भी श्राद्ध नहीं करते हैं, उनके पितर दु:खी व निराश होकर शाप देकर अपने लोक वापिस लौट जाते हैं और बाध्य होकर श्राद्ध न करने वाले अपने सगे-सम्बधियों का रक्त चूसने लगते हैं। फिर इस अभिशप्त परिवार को जीवन भर कष्ट-ही-कष्ट झेलना पड़ता है और मरने के बाद नरक में जाना पड़ता है।
√ मार्कण्डेय पुराण में बताया गया है कि, जिस कुल में श्राद्ध नहीं होता है, उसमें दीर्घायु, निरोग व वीर संतान जन्म नहीं लेती है और परिवार में कभी मंगल नहीं होता है।
पितृ नाराज होने के क्या लक्षण हैं?
पितरों के नाराज़ होने के मुख्य लक्षण हैं जीवन में बार-बार बाधाएँ आना, विवाह और संतान प्राप्ति में रुकावट, घर में लगातार कलह, व्यापार में नुकसान, और सपने में पितरों को दुखी या रोते हुए देखना. ये भी माना जाता है कि अचानक घर में कोई बीमार रहे या दुर्घटनाएँ बढ़ें तो पितृदोष हो सकता है।
जीवन में आने वाली बाधाएँ:--
मांगलिक कार्यों में विघ्न:---विवाह या किसी शुभ कार्य को करने में लगातार रुकावटें आना।
व्यापार और धन संबंधी समस्याएँ:--नौकरी में बार-बार असफलता या व्यापार में लगातार घाटा होना।
स्वास्थ्य समस्याएँ:--घर के किसी सदस्य या परिवार के सदस्यों को लगातार बीमार रहना या अचानक दुर्घटनाओं का सामना करना, पारिवारिक और व्यक्तिगत समस्याएँ।
संतान सुख में बाधा:---संतान पैदा करने में मुश्किल आना या संतान से कष्ट प्राप्त होना।
वैवाहिक जीवन में समस्याएँ:---विवाह में देरी होना या शादी के बाद वैवाहिक जीवन में कलह रहना.
घर में अशांति:---लगातार झगड़े और कलह की स्थिति बनी रहना।
सपने और घर के संकेत:--
सपने में पितरों को देखना:---सपनों में अपने पूर्वजों (पितरों) को दुखी, रोते हुए या परेशान देखना.
सपने में बाल निकलना:---खाना खाते समय खाने में बाल निकलना भी पितरों की नाराज़गी का संकेत माना जाता है।
घर में अचानक पीपल का उगना:---घर के आंगन या किसी अन्य जगह पर अचानक पीपल का पौधा उगना भी पितृदोष का संकेत होता है।
श्राद्ध नहीं करने से क्या होता है?
कहते हैं कि, जो लोग पितृपक्ष में अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करते हैं, उन्हें आजीवन बड़े कष्टों का सामना करना पड़ता है. ऐसे लोग जीवन में कभी सुखी नहीं रहते हैं. ज्योतिषविद कहते हैं कि पितृपक्ष में पूर्वजों का श्राद्ध न करने से पितृदोष लगता है और यही पितृदोष जीवन में बड़ी समस्याओं का कारण बनता है।
मरने के कितने साल बाद श्राद्ध करना चाहिए?
श्राद्ध मृत्यु के बाद पहले एक साल तक नहीं किया जाता है, बल्कि मृत्यु के एक साल बाद वार्षिक श्राद्ध (जिसे बरसी भी कहते हैं) किया जाता है, और उसके बाद हर साल पितृ पक्ष में किया जाता है। मृत्यु के पहले साल तक आत्मा की शुद्धिकरण प्रक्रिया चलती है और इस दौरान कोई भी श्राद्ध नहीं किया जाता है।
श्राद्ध किसका होता है?
अपने पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं, उन्हें तृप्त करने की क्रिया को तर्पण कहा जाता है, तर्पण करना ही पिंडदान होता है. भाद्रपद की पूर्णिमा से अश्विन कृष्ण की अमावस्या तक कुल 16 दिन तक श्राद्ध रहते हैं।
बंधे हुए पितरों को कैसे खोलें?
बंधे हुए पितरों को खोलने या पितृ दोष से मुक्ति के लिए पितृपक्ष में तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करना चाहिए, ब्राह्मणों को भोजन कराएं, पूर्वजों के नाम से दान दें, धार्मिक पाठ करें, मंत्रों का जाप करें और पवित्र कर्म करें. आप पितरों के प्रतिनिधि गाय, कुत्ते और कौए को भोजन करा सकते हैं, तथा हनुमान चालीसा का पाठ या पिपल के पेड़ की परिक्रमा जैसे उपाय कर सकते हैं. यदि समस्या अधिक गंभीर है, तो किसी योग्य गुरु या ज्योतिषी से सलाह लेना उचित रहेगा।
स्त्रियों का श्राद्ध कब करना चाहिए?
- सुहागिन महिलाओं का श्राद्ध पितृ पक्ष की नवमी तिथि को करना चाहिए, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी तिथि को हुई हो. - ब्रह्मचारी या संन्यासियों का श्राद्ध पितृपक्ष की द्वादशी तिथि को ही करें. - नाना-नानी का श्राद्ध अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को ही करना चाहिए, चाहें उनकी मृत्यु किसी भी तिथि में हुई हो।
पूर्वजों की शक्तियां क्या हैं?
मान्यता यह है कि अब चूँकि वे इस दुनिया से चले गए हैं, इसलिए उनमें हमारे लिए ईश्वर से प्रार्थना करने कि, शक्ति है। पूर्वजों में यह शक्ति होती है कि, वे हमें तब आशीर्वाद या श्राप दे सकते हैं जब वे प्रसन्न न हों । हालाँकि, वे हमें तब भी आशीर्वाद या श्राप दे सकते हैं जब वे प्रसन्न न हों। परिणामस्वरूप, ईश्वर से भी अधिक उनका भय और सम्मान किया जाता है।
पूर्वजों को खुश करने के लिए क्या करें?
पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए, आप दान कर सकते हैं, जरूरतमंदों की मदद कर सकते हैं, पितृ पक्ष के दौरान पितरों का श्राद्ध और तर्पण कर सकते हैं, पीपल के पेड़ की पूजा कर सकते हैं, घर के दक्षिण दिशा में दीपक जला सकते हैं, और अपने माता-पिता का सम्मान कर सकते हैं।
घर में पितृ दोष हो तो कैसे पता करें?
घर में पीपल के पौधे का उगना भी पितृ दोष का एक लक्षण माना गया है। घर के आंगन, घर की दरारों या टूटे गमलों में पीपल का पौधा उगना बुरा संकेत माना जाता है, अगर व्यक्ति को कड़ी मेहनत के बाद भी नौकरी चाकरी व व्यापार में परेशानियां आती हैं तो इसे पितृ दोष का एक संकेत माना जाता है।
पितरों का दर्शन कैसे होता है?
पितरों के प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होते, बल्कि उनके दर्शन स्वप्न में हो सकते हैं, जो एक शुभ संकेत हो सकता है यदि वे प्रसन्न दिखें या आपको कुछ दें। यह भी माना जाता है कि, पितर घर में खुश रहते हैं, जिसका संकेत है कि, घर में मुरझाए फूल फिर से खिल सकते हैं या कौआ घर के आँगन में बैठे। पितरों को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए, उनके गुणों के अनुसार जीवन जीना, सात्विक भोजन करना, और पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म करना महत्वपूर्ण है।
पितृ दोष से बचने के लिए कौन सा रत्न पहनना चाहिए?
पितृ दोष के प्रभाव को कम करने के लिए माणिक रत्न धारण करने की सलाह दी जाती है, क्योंकि यह सूर्य को मजबूत करता है और अशुभ ग्रहों के प्रभावों को दूर करता है। कुछ ज्योतिषीय मतों के अनुसार हकीक या गोमेद रत्न भी लाभकारी होते हैं। हालांकि, किसी अनुभवी ज्योतिषी से परामर्श लेना महत्वपूर्ण है, क्योंकि रत्न का प्रभाव व्यक्ति की जन्म कुंडली के अनुसार होता है।
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अनिल सुधांशु
ज्योतिषाचार्य
नीम करौली आश्रम कैंची धाम नैनीताल (उत्तरांचल)
अलखनाथ मंदिर, किला बरेली (उत्तर प्रदेश)
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